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    SUNDAY READ// “आबादी 23 लाख, 14 लाख गाड़ियां, 460 ट्रैफिक पुलिसकर्मी—VIP संस्कृति के नीचे दम तोड़ता भोपाल!”

    suntodayBy suntodayMarch 22, 2026Updated:April 13, 2026No Comments39 Views6 Mins Read
    भोपाल में BRTS को सही तरीके से कभी लागू ही नहीं किया गया. विशेषज्ञ मानते हैं कि सही मॉडल का 20 प्रतिशत भी जमीन पर नहीं उतरा. इसके बाद फ्लाईओवर को समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और हरियाली के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जा रही. चौड़ी सड़कें शहर की गति बढ़ाती हैं, लेकिन जीवन नहीं.
    देशदीप सक्सेना
    भोपाल:

    भोपाल की  ट्रैफिक समस्या अब किसी खास चौराहे या समय तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पूरे शहर की रोजमर्रा की पीड़ा बन चुकी है. सवाल यह है कि क्या सरकार और प्रशासन  राजधानी की इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार है? या उसने अपनी आँखे बंद कर रखी हैं और जनता को ट्रैफिक जाम के हवाले  छोड़ दिया है.

    आबादी और वाहनों का विस्फोट

    भोपाल मध्य प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. 1951 में मात्र एक लाख की आबादी वाला यह शहर 2011 में 18.86 लाख तक पहुंच गया. ड्राफ्ट मास्टर प्लान 2031 के अनुसार वर्तमान आबादी लगभग 23 लाख है, जो हर साल 2.56 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है.

    इसी अनुपात में वाहनों की संख्या ने भी शहर पर बोझ बढ़ाया है. 2002 में जहां करीब 3 लाख वाहन थे, वहीं आज यह संख्या 14  लाख के आसपास हो चुकी है. इनमें से 10.8 लाख दोपहिया और लगभग 2.9 लाख चार पहिया वाहन हैं. हर साल औसतन 10 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद ट्रैफिक प्रबंधन उसी पुराने ढांचे पर टिका हुआ है.

    पिछले बीस वर्षों में भोपाल ने कोलार, रोहित नगर, बावड़िया कला, अवधपुरी, बैरागढ़, होशंगाबाद रोड और मंडीदीप की दिशा में बड़ा विस्तार किया है. लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था आज भी उसी पुरानी मानसिकता से ही चलाई जा रही है. नए इलाकों में न पर्याप्त सिग्नल हैं, न ट्रैफिक पुलिस की नियमित तैनाती. नतीजा यह है कि बड़े हिस्से में ट्रैफिक “अपने हाल” पर चल रहा है. यहाँ ट्रैफिक बेकाबू है.

    अब जरा  इस विकराल  समस्या पर सरकार की उदासीनता और  भोपाल पुलिस की लाचारी पर नज़र डालिये. भोपाल में ट्रैफिक पुलिस की स्वीकृत संख्या 850 है, लेकिन वास्तव में केवल करीब 460 जवान ही उपलब्ध हैं. इनमें से भी लगभग 70 प्रतिशत ही रोजाना  सड़कों और चौराहों पर तैनात हो पाते हैं. त्योहार, शाम का दबाव या VIP मूवमेंट होने पर पूरा बल सड़कों पर दिखता है, लेकिन सामान्य दिनों में अधिकांश शहर बिना ट्रैफिक पुलिस के ही चलता है.  ये सरकारी आंकड़े हैं.  एक बार फिर से  गौर कीजिये. 23 लाख जनसंख्या , 14 लाख वाहन  और  सिर्फ 450  ट्रैफिक पुलिस. ये ऊँट के मुँह में जीरा भी नहीं है.

    भोपाल में ट्रैफिक पुलिसिंग का मतलब अब केवल हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनने पर चालान काटना रह गया है. ओवरस्पीडिंग, रॉन्ग साइड ड्राइविंग और लेन उल्लंघन जैसे खतरनाक अपराधों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है—क्योंकि उन्हें रोकने के लिए पर्याप्त बल ही नहीं है.
    सीसीटीवी कैमरों से रोज लगभग 500-700  ई-चालान जारी होते हैं, लेकिन क्या चालान ही ट्रैफिक सुधार का विकल्प हैं?

    VIP संस्कृति बनाम आम नागरिक

    शायद सरकार पर  इसलिए इसका प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि   ट्रैफिक पुलिस की सबसे बड़ी प्राथमिकता VIP मूवमेंट बन चुकी है. मुख्यमंत्री, मंत्री और अन्य विशिष्ट लोगों के काफिलों के लिए पूरे शहर की रफ्तार थाम दी जाती है. आम नागरिक दिन भर  जाम में फंसा रहता है. उसके हिस्से में या तो चालान आता है या डांट.

    यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या ट्रैफिक व्यवस्था जनता के लिए है या VIP संस्कृति के लिए?
    सरकारी सूत्रों का कहना है, “हमारी प्राथमिकता जनता के चुने मतलब नेताओं की  राह आसान करना है. जनता नहीं”.
    यहाँ  एक और  महत्वपूर्ण पहलू है. नीति आयोग द्वारा जारी शहरी परिवहन सूचकांक (Sustainable Urban Transport Index – SUTI) ,एक ऐसा पैमाना है जो शहरों में परिवहन प्रणालियों की स्थिरता (पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक) को मापता है, के अनुसार  भोपाल में लगभग 43  प्रतिशत लोग या तो पैदल  चलते हैं या फिर साइकिल का उपयोग करते हैं,  जबकि 25 प्रतिशत लोग  दो पहिया वाहनों का उपयोग करते हैं, सिर्फ दो प्रतिशत  ट्रैफिक चार पहिया वाहनों और 3  प्रतिशत ऑटो रिक्शा का है. लेकिन  इन 43 प्रतिशत ‘ असली भारत’  की परवाह किसी को दिखाई  नहीं  देती. आने वाले समय में फुटपाथ   की बलि सडकों को चौड़ा करने  के लिए  दिया जाना तय है. पैदल चलने वालों के लिए  ये शहर बिलकुल सेफ नहीं है.


    जहां समाधान आसान हैं, वहां भी चुप्पी
    पॉलिटेक्निक चौराहा, रवींद्र भवन के सामने  का क्षेत्र – जो राज भवन  अब लोक भवन को CM  बंगले से जोड़ता है और जहांगीराबाद से जवाहर चौक तक का मार्ग—ये सभी ऐसे इलाके हैं जहां थोड़े से निर्णय से ट्रैफिक डी-कंजेशन संभव है. दोनों क्षेत्र पुराने भोपाल को नए भोपाल से जोड़ते हैं और यहाँ दोनों ओर सरकारी जमीन उपलब्ध होने के बावजूद सड़क विस्तार फाइलों से बाहर नहीं आ पा रहा. जब जगह है, तो इच्छाशक्ति क्यों नहीं?BRTS, फ्लाईओवर और विकास का भ्रमभोपाल में BRTS को सही तरीके से कभी लागू ही नहीं किया गया. विशेषज्ञ मानते हैं कि सही मॉडल का 20 प्रतिशत भी जमीन पर नहीं उतरा. इसके बाद फ्लाईओवर को समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और हरियाली के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जा रही. चौड़ी सड़कें शहर की गति बढ़ाती हैं, लेकिन जीवन नहीं.2024 में भोपाल में औसतन रोज़ आठ सड़क हादसे हुए, जिनमें हर दूसरे हादसे में एक जान गई. करोड़ों के निवेश के बावजूद यदि मौतें नहीं रुक रहीं, तो यह विकास नहीं, बल्कि नीति की विफलता है.मेट्रो से उम्मीद, लेकिन अधूरी तैयारी

    BRTS  के टाँय टाँय फिस्स  और करोड़ो  की बर्बादी के बाद  भोपाल पर थोपी गयी मेट्रो से लोगों को उम्मीद है, लेकिन निर्माण की रफ्तार बेहद धीमी है. मेट्रो शहर के सीमित हिस्से तक ही पहुंचेगी और सड़क ट्रैफिक का पूर्ण समाधान नहीं बन सकती. इसके लिए एक समग्र और ईमानदार शहरी परिवहन नीति की जरूरत है. खुद सरकारी सर्वे बताते हैं की  मेट्रो में यात्रियों का टोटा रहेगा. इंदौर  में चल रही मेट्रो में ये देखा भी जा रहा है.

    भोपाल को अब यह तय करना होगा कि वह सिर्फ गाड़ियों के लिए शहर बनना चाहता है या इंसानों के लिए. ट्रैफिक सुधार केवल चालान, VIP प्रबंधन और फ्लाईओवर-कभी कभी 90 डिग्री के-  से नहीं होगा. इसके लिए जवाबदेही, दीर्घकालिक सोच और नागरिक-केंद्रित नीति जरूरी है. सवाल सिर्फ इतना है—क्या सरकार के नुमाइंदे सुनने को तैयार है या ट्रैफिक पुलिस के साये में  सड़कों पर काले शीशे की गाड़ी में  सर्र  से  बंगले से सेक्रेटेरिएट के सफर में उन्हें कुछ दिखाई और सुनाई नहीं देता.
    Bhopal City Traffic commissioner of police Madhya Pradesh Police Traffic traffic chaos
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