पिछले दो वर्षों में मुख्यमंत्री सचिवालय, जनसंपर्क निदेशालय में और अन्य लगातार ब्यूरोक्रेटिक फेरबदल को देखते हुए, नौकरशाही और राजनीतिक हलकों में इस बात पर चर्चा चल रही है कि मुख्यमंत्री अधिकारियों से किस तरह के प्रदर्शन की उम्मीद रखते हैं और क्यों उन्हें बार–बार फेरबदल करना पड़ रहा है
भोपाल: अपने पहले दो वर्षों के कार्यकाल में नौकरशाही में बार–बार होने वाले फेरबदल के बावजूद ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपने प्रशासन में अभी भी सही जगह पर सही व्यक्ति की तलाश में हैं.
अपने वर्तमान कार्यकाल के आधे हिस्से से मात्र छह महीने दूर, मुख्यमंत्री के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उन्होंने अपने पद को मजबूत करने के लिए वह सब कुछ किया है जिसकी उन्हें जरूरत थी और क्या यह उनके आलोचकों को—जो भारतीय जनता पार्टी के अंदर और बाहर हैं—चुप कराने के लिए पर्याप्त है?
विधानसभा चुनाव में जीत के बाद 2023 में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठित कुर्सी के लिए चुना, जबकि चुनाव में प्रचंड बहुमत के बाद उस समय के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कुर्सी पर स्वाभाविक दावा था. कई अन्य वरिष्ठ नेता ऐसे थे जिन्हें दिल्ली की राजनीति से वापस कर मध्य प्रदेश भेजा गया था और चौहान के मुख्यमंत्री न बनाए जाने की स्थिति में उनका दावा भी मुख्यमंत्री पद पर मजबूत था.
पिछले दो वर्षों में मुख्यमंत्री सचिवालय, जनसंपर्क निदेशालय में और अन्य लगातार ब्यूरोक्रेटिक फेरबदल को देखते हुए, नौकरशाही और राजनीतिक हलकों में इस बात पर चर्चा चल रही है कि मुख्यमंत्री अधिकारियों से किस तरह के प्रदर्शन की उम्मीद रखते हैं और क्यों उन्हें बार–बार फेरबदल करना पड़ रहा है.
सच्चाई तो यह है कि अधिकारी भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि मुख्यमंत्री को किस तरह का प्रदर्शन चाहिए.
13 दिसंबर, 2023 को अपना पदभार संभालने के बाद डॉ. यादव ने राघवेंद्र सिंह को अपने सचिवालय का नेतृत्व करने के लिए चुना. बाद में अतिरिक्त मुख्य सचिव (एसीएस) डॉ. राजेश राजोरा को मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) में लाया गया. इसके तुरंत बाद, सीएमओ में पहले बड़े बदलाव के दौरान राघवेंद्र सिंह को राजस्व विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया.
संजय कुमार शुक्ला को जून, 2024 के दूसरे सप्ताह में मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव नियुक्त किया गया, लेकिन उन्हें अपने कार्यकाल के छह महीनों के अंदर ही शहरी विकास विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया.
संदीप यादव, जो विवेक पोरवाल के बहुत छोटे कार्यकाल के बाद डॉ. यादव द्वारा चुने गए दूसरे आयुक्त जनसंपर्क (सीपीआर) थे, उन्हें सचिव के रूप में स्वास्थ्य विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया.
भरत यादव को फरवरी 2024 में मुख्यमंत्री सचिवालय में सचिव के रूप में लाया गया, जहां से लगभग एक वर्ष बाद उनका स्थानांतरण मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में प्रबंध निदेशक के रूप में कर दिया गया. डॉ. राजोरा को लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी में अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया.
डॉ. राजोरा की जगह एसीएस नीरज मंडलोई को लाया गया, जो जुलाई 2025 से सीएमओ में नौकरशाही व्यवस्था का नेतृत्व कर रहे हैं.
कई अन्य आईएएस अधिकारियों को अलग–अलग पदों पर सीएमओ में लाया गया और बाद में वहां से स्थानांतरित कर दिया गया.
डॉ. मोहन यादव ने 13 दिसंबर, 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
दिलचस्प बात यह है कि फरवरी 2024 में मुख्यमंत्री कार्यालय के जारी आदेश में एक बड़ी गलती हुई, जिसमें रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) के अध्यक्ष के साथ–साथ राज्य सरकार के विभिन्न बोर्डों, निगमों और प्राधिकरणों के 45 अध्यक्षों एवं उपाध्यक्षों की नियुक्ति को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया.
इन लोगों को, जिनमें ज्यादातर सत्तारूढ़ पार्टी के नेता थे, उस समय की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने नियुक्त किया था.
हालांकि इस कदम को प्रशासन को पुनर्गठित करने के उद्देश्य से देखा गया, लेकिन इसमें गड़बड़ी यह थी कि रेरा अध्यक्ष, जो प्रशासन में अतिरिक्त मुख्य सचिव रह चुके थे और जिन्हें रेरा में कानूनी रूप से पांच वर्ष के लिए नियुक्त किया गया था, को भी उस आदेश के अनुसार उनके पद से हटा दिया गया.
रेरा अध्यक्ष एपी श्रीवास्तव ने इस आदेश को तुरंत अदालत में चुनौती दी. कानूनी रूप से सरकार उनकी सेवा तब तक समाप्त करने की स्थिति में नहीं थी, जब तक उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप साबित न हो जाएं या कोई अन्य विशेष परिस्थिति न हो. अंततः रेरा प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई जीत ली और सरकार की भारी फजीहत हुई.
जनसंपर्क निदेशालय, जिसे सरकार की योजनाओं और नीतियों के प्रचार के साथ लोगों तक पहुंचने तथा मुख्यमंत्री की छवि बनाने की जिम्मेदारी है, में पिछले दो वर्षों में एक के बाद एक चार आयुक्त बदले जा चुके हैं और वर्तमान में पांचवे आयुक्त ने अपनी जिम्मेदारी सम्हाली हुयी है.
विवेक पोरवाल पहले आयुक्त थे जिन्हें डॉ. मोहन यादव ने उस समय के सीपीआर मनीष सिंह की जगह लेने के लिए चुना था. मनीष सिंह को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के दौरान मीडिया और निदेशालय के बीच बढ़ते अंतर को कम करने के लिए तथा सरकारी योजनाओं और नीतियों के गहन प्रचार के लिए कई कदम उठाने हेतु निदेशालय में नियुक्त किया गया था.
विवेक पोरवाल की नियुक्ति के दस दिनों के अंदर उनके स्थान पर संदीप यादव को लाया गया. संदीप यादव के बाद सुदाम खाड़े आयुक्त बने. खाड़े तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चौथे कार्यकाल में भी जनसंपर्क आयुक्त थे.
इस वर्ष सितंबर में सुदाम खाड़े की जगह दीपक सक्सेना को लाया गया, जो अपनी नियुक्ति से पहले जबलपुर के कलेक्टर थे. रोशन कुमार सिंह, जो संदीप यादव की सहायता के लिए जनसंपर्क निदेशालय में निदेशक थे, उन्हें इस वर्ष सितंबर में उज्जैन कलेक्टर के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया.
निदेशालय में हाल ही में अधिकारियों, कर्मचारियों और सरकार के बीच एक बड़ा टकराव देखने को मिला, जब अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने एक राज्य प्रशासनिक अधिकारी को वहां अतिरिक्त निदेशक के रूप में नियुक्त करने के विरोध में हड़ताल कर दी.
एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि सरकार में विशेष पदों पर अधिकारियों के बार–बार स्थानांतरण से नौकरशाही के मन में एक गहरा संदेह पैदा हो गया है कि मुख्यमंत्री नौकरशाही से क्या उम्मीद करते हैं?
नाम न बताने की शर्त पर अधिकारी ने कहा कि विशेष पदों पर अस्थिरता बनी हुई है.
इस अधिकारी ने कहा कि किसी भी सरकार की नीति और योजनाओं को लागू करने तथा जनता के बीच उसकी स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण पदों पर स्थिरता एक बड़ा कारक होती है. शिवराज सिंह चौहान सरकार के दौरान देखा गया कि चौहान ने कुछ अधिकारियों पर भरोसा किया और इसका लाभ हुआ. बार–बार स्थानांतरण से अधिकारियों का मनोबल गिरता है और उनके मन में अनिश्चितता पैदा होती है जो सरकार के कामकाज के लिए अच्छा नहीं है.
अधिकारी ने कहा कि यह बात सही है कि चूंकि डॉ. मोहन यादव का मुख्यमंत्री के रूप में यह पहला कार्यकाल है, इसलिए उन्हें अधिकारियों को समझने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन अंततः उन्हें काम करने और परिणाम देने वाले अधिकारियों पर भरोसा करना होगा तथा उन्हें परिणाम प्राप्त करने के लिए उचित समय देना होगा.
अधिकारी ने कहा कि इसे समझने के लिए कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं.
जैसे, चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला विधानसभा चुनाव यानी 2008 में उन्हें कठिनाई आई थी. उनका पहला कार्यकाल मात्र तीन वर्ष का था क्योंकि उस पांच वर्ष के कार्यकाल में पहले उमा भारती और बाद में बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने थे.
उस चुनाव से पहले ही अधिकारियों ने चौहान की महिला सशक्तीकरण के प्रति रुचि को देखते हुए मुख्यमंत्री निवास में महिलाओं की पहली पंचायत आयोजित कराई. उसके पहले ही मुख्यमंत्री कन्यादान योजना शुरू कर दी क्योंकि सांसद के रूप में चौहान गरीब एवं अनाथ लड़कियों को गोद लेकर उनका विवाह कराते थे.
अधिकारियों ने चौहान की लाड़ली लक्ष्मी योजना से लेकर लाड़ली बहना योजना तक प्रमुख भूमिका निभाई तथा चौहान का महिलाओं के बीच एक अच्छा–खासा वोट बैंक पैदा कर दिया. 2018 के चुनाव में संबल योजना मास्टर स्ट्रोक साबित हुई. अधिकारियो ने संबल योजना को लागू करने तथा इसके प्रचार प्रसार में महती भूमिका निभायी जबकि उस समय वित्त का संकट था. यही कारण था कि भारी एंटी–इनकंबेंसी के बाद भी चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से मात्र पांच सीटें कम मिलीं तथा 2023 में लाड़ली बहना रथ पर सवार चौहान ने भाजपा को प्रचंड बहुमत दिला दिया.
एक सरकारी अधिकारी ने दावा किया कि प्रदेश में अनिश्चितता के कारण कई आईएएस अधिकारी केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर अपनी पोस्टिंग ढूंढ रहे हैं. यह भी सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं है. मुख्यमंत्री को वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ बैठकर उनकी बात सुनने की जरूरत है ताकि वे समझ सकें कि नौकरशाही में क्या चल रहा है और वे प्रशासन में स्थिरता लाने के लिए क्या कर सकते हैं.
जहां तक विभागों के कामकाज का सवाल है, बार–बार बदलाव सरकारी विभागों के साथ–साथ उनके कामकाज को भी रास नहीं आए हैं.
एक मंत्री ने नाम न बताने की शर्त पर पूछा कि जब महत्वपूर्ण पदों पर बार–बार बदलाव हो रहे हों तो किसी विभाग से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कैसे की जा सकती है और फिर उस समीक्षा का मतलब क्या है जब अधिकारी ही अपने पदों पर एक वर्ष भी नहीं रह पाएं.
उन्होंने आगे कहा, “इससे पहले कि कोई अधिकारी विभाग के कामकाज को समझे और योजना को लागू करना शुरू करे, उन्हें दूसरी जगहों पर भेज दिया जाता है.”
एक अनुमान के अनुसार, पिछले दो वर्षों में लगभग 300 आईएएस और 150-200 आईपीएस अधिकारियों को उनके पदों से हटाया गया है.

