वर्ष 2014 से 2018 के सालों में 535, वर्ष 2019 से 2023 तक के सालों में 805 प्रश्न ऐसे रहे जिनके उत्तर कभी आये ही नहीं शायद ये भी किसी ने सोचा नहीं था. हाल की स्थिति देखें तो जुलाई 2025 के सत्र तक 502 प्रश्नों के उत्तर विभागों ने नहीं भेजे हैं, उसपर कमाल ये कि किसी की जिम्मेदारी तय नहीं. इस गंभीर स्थिति पर विधान सभा, पक्ष-प्रतिपक्ष को कोई असर नहीं, संवेदनाएं शून्य जनता और उसके सरोकार गौण.
ये भी जानिये कि वर्ष 2012 से लोकायुक्त के किसी प्रतिवेदन पर सदन में चर्चा नहीं हुई है और तो और साल 2015 से लोकायुक्त के प्रतिवेदन विधान सभा को भेजे ही नहीं जा रहे हैं .
सरकार के पास भ्रष्ट अफसरों के अभियोजन स्वीकृति के सैकडों मामले लंबित हैं.
भगवानदेव ईसरानी
पूर्व प्रमुख सचिव, मध्य प्रदेश विधान सभा
जन सरोकारों की जब-जब बात होगी तो लोकतंत्र के मंदिर सहित मीडिया की बात जरूर होगी क्योंकि यही दो ऐसे प्रभावी माध्यम हैं जो सरकार को जिम्मेदार ठहराने का साहस रखते हैं या जिन्हें संविधान ने ये अधिकार दिया है. और ये दोनों जिस तंत्र की निगरानी करते हैं या जिसको आईना दिखाते हैं उस सरकार की बात के बिना विषय के साथ पूरा न्याय नहीं होगा.
बात विधान सभा से ही शुरू करते हैं 25 साल का सफर है तो सन 2000 का साल वो स्वर्णिम काल था जब विधान की सर्वाधिक 72 बैठकें हुईं, तीन बडे-बडे सत्र यानि साल भर मंदिर में घंटियों की आवाज सरकार, नौकरशाही सतर्क और मुस्तैद.
जैसे –जैसे साल आगे बढे नई सरकार आई उसी दौरान साल 2020 भी आया जब साल भर में मात्र 4 बैठकें ही हुईं, नौकरशाही का मानों स्वर्णिम काल आ गया. 2020 के बदनुमा दाग को कोरोना काल पर ठेला गया लेकिन कोरोना तो पूरे देश में था. हमारे साथ रहे छत्तीसगढ राज्य में भी वहां इसी साल में 5 सत्र और 34 बैठकें हुईं, कैसे?

सत्र लगातार छोटे से छोटे वो भी आधे अधूरे, चर्चा और जन समस्याों के निदान का माहौल समाप्त होता गया. सरल शब्दों में कहें नौकरशाही मजबूत होती गई और जनता लाचार. किसी नें कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन ऐसा आएगा जब विधान सभा का बजट सत्र एक दिन का होगा.
बजट सत्र में विभागीय बजट पर चर्चा नही अधिकांश विभागीय मांगें गुलेटिन यानि बिना चर्चा के पारित, नौकरशाही और मंत्रियों पर लगाम और जिम्मेदारी के एहसास का ये अवसर भी समाप्त इसका दुष्परिणाम क्या हुआ?
विधान सभा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्नकाल की नौकरशाही उपेक्षा करनें लगी. प्रश्नों के उत्तर गलत, अधूरे और जवाब देनें में टालमटोल.
वर्ष 2014 से 2018 के सालों में 535, वर्ष 2019 से 2023 तक के सालों में 805 प्रश्न ऐसे रहे जिनके उत्तर कभी आये ही नहीं शायद ये भी किसी ने सोचा नहीं था.
हाल की स्थिति देखें तो जुलाई 2025 के सत्र तक 502 प्रश्नों के उत्तर विभागों ने नहीं भेजे हैं, उसपर कमाल ये कि किसी की जिम्मेदारी तय नहीं.
इस गंभीर स्थिति पर विधान सभा, पक्ष-प्रतिपक्ष को कोई असर नहीं, संवेदनाएं शून्य जनता और उसके सरोकार गौण.
ये भी जानिये कि वर्ष 2012 से लोकायुक्त के किसी प्रतिवेदन पर सदन में चर्चा नहीं हुई है और तो और साल 2015 से लोकायुक्त के प्रतिवेदन विधान सभा को भेजे ही नहीं जा रहे हैं.
सरकार के पास भ्रष्ट अफसरों के अभियोजन स्वीकृति के सैकडों मामले लंबित हैं.
वर्ष 2004 से आज तक 15 न्यायिक आयोग बने, निश्चित ही गंभीर घटनाओं की जांच के लिये ही लेकिन किसी जांच आयोग की रिपोर्ट पर सदन में चर्चा नहीं, 7 रिपोर्ट तो सरकार की अलमारी में ही बंद हैं. ऐसे में, प्रदेश में, भ्रष्टाचार और जन सरोकारों की स्थिति क्या होगी आप खुद ही समझ लें.
सरकार को आइना दिखाने वाला मेनस्ट्रीम मीडिया अपने आर्थिक हितों तक ही सीमित हो गया है. प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मीडिया को दिये जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर जो खर्च साल 2011-2012 में लगभग 41 करोड़ रूपये था वह 2023 के दिसम्बर माह तक 557.27 करोड़ हो गया. आंकडे आनें दीजिये 2025-2026 के आते-आते यह खर्च 1000 करोड़ रूपये से उपर होगा.
फ्रीबी की बातें बहुत होती हैं, सुप्रीम कोर्ट तक. साल 2019-2020 से 2023-2024 के दौरान प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के सर्वाधिक लाभार्थी 4-4 मीडिया समूहों की बात करें तो दैनिक भास्कर, पत्रिका, नव दुनिया और नई दुनिया इन्दौर को न्यूनतम 20 से अधिकतम 25 करोड़ रूपये के विज्ञापन पिछले 6 वर्षों में मिले, वहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया को देखें तो बंसल न्यूज, आईबीसी 24, टीव्ही 18, जी न्यूज को न्यूनतम 27 करोड़ से 36 करोड़ रूपये तक के विज्ञापन मिले हैं ये फ्रीबी नहीं तो और क्या है?
जनता की कमाई जनता की आवाज बंद करने के लिये खर्च हो रही है और कोई कुछ कहने को तैयार नहीं? सरकार नें ढूंढ ढूंढ कर पूरे प्रदेश के दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों जिनकी संख्या 10891 है, को विज्ञापन दिये हैं. इसी तरह 523 इलेक्ट्रनिक मीडिया समूहों को विज्ञापन दिये हैं यानि प्रदेश भर में जनता की आवाज के दरवाजे बंद.
आज सरकार का सरोकार एन केन प्रकारेण चुनाव जीतना रह गया है और मीडिया का काम सरकार का बचाव करने का.
आप सोचें लाडली लक्ष्मी योजना जहां पहुंचाना थी पहुंच चुकी है फिर भी उसके प्रचार पर अप्रेल 23 से अक्टूबर 23 के दौरान 259.53 करोड़ रूपये खर्च किये, किसके लाभ के लिये? विकास के नाम पर हर महीने सरकार द्वारा लिया जा रहा कर्ज आखिर जा कहां रहा है?
जुलाई 24 में सरकार ने स्वीकार किया है कि उद्यम क्रांति योजना के 3036 तथा एमएसएमई प्रोत्साहन योजना के 2432 मामलों में क्रमश: 1078.58 करोड़ और 161 करोड़ की राशि का भुगतान नहीं हो पाया है.
एक छोटा मामला देखिये. बाल आशीर्वाद योजना में प्रत्येक अनाथ बच्चे को चार हजार रूपये मासिक देने की शासन की योजना है जिसे 9 माह का उन्हें भुगतान शेष है.
कुपोषित बच्चों के लिये दिन में मात्र 8 रूपये का खर्च वो भी केंद्र से आता है इसमें राज्य सरकार का कोई योगदान नहीं, दिव्यांगों को आंध्र में 6 हजार, हरियाणा में 3 हजार, हमारे यहां महीने में मात्र 600 रूपये महीना यानि जहां से वोट आये या वोटर को भरमाया जा सके खर्च वहीं करना है.
सात कृषि कर्मण पुरूस्कार लेने वाली सरकार ने, किसानों के हालात सुधारने के लिये कृषि कैबिनेट बनाई थी. कृषि का बजट अलग प्रस्तुत किया गया. इसी प्रकार गौ कैबिनेट का भी गठन हुआ था. कृषि कैबिनेट की अंतिम बैठक 11.9.2017 और गौ कैबिनेट की एक मात्र बैठक 18.11.2020 को हुई, यानि मामला कागजों में और किसानों की आय दुगनी करनें की घोषणा सिर्फ फाइलों में.
अनुसूचित जाति और जनजाति को बीज उपलब्ध करानें वाली अन्नपूर्णा योजना और सूरजधारा योजना बंद,लघु और सीमांत किसानों को प्रमाणित बीज उपलब्ध करानें वाली बाडी किचन योजना भी बंद.
रोजगार की स्थिति ये है कि प्रदेश के विभागों में 50 से 60 प्रतिशत पद खाली हैं, निवेश के नाम पर रोजगार की बातें सालों से हो रही हैं लेकिन सच्चाई ये है कि प्रदेश का युवा अच्छे रोजगार के लिये बैंगलोर, बंबई, दिल्ली, गुडगांव, पूना या विदेश का मुंह ही देखता है.
शिक्षा की हालत ये है कि 2014 से एक भी नई प्राथमिक, माध्यमिक शाला प्रदेश में नहीं खुली वरन 3719 शालाएं, 959 हाई स्कूल और 785 हायर सेकेण्डरी स्कूल बंद हो चुके हैं.
हर खासो-आम को प्राइवेट स्कूलों के हवाले कर दिया गया है.
सरकार ने स्वीकार किया है कि 2011 से 2021-2022 के दौरान शासकीय स्कूलों में 40.96 लाख बच्चों नें कम प्रवेश लिया है.
सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं है. बाल मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर, कुपोषण में हम किसी भी राज्य से पीछे नहीं हैं.
प्रति व्यक्ति आय में 28 राज्यों में हम 22 वें नंबर पर हैं.
संक्षेप इस अवधि में प्रदेश की जनता की हैसियत लगभग समाप्त हो गई है उसके मुद्दों, पीड़ाओं और आवाज को कोई सुनने वाला तंत्र पूरी तरह सरकारी हो गया है. एक अजीब सा सन्नाटा है.
बात कड़वी जरूर है लेकिन सच्चाई यही है कि बीते 25 साल जन सरोकार के नहीं सिर्फ चुनावी जीत का सरोकार लिये ही रहे.
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

