जैसे पेड़ो की ये अंधाधुंध कटाई ही पर्याप्त नहीं थी, अब अयोध्या बाई पास के चौड़ीकरण में लगभग 8000 पेड़ों को काटा जाना तय है. सिर्फ दिसंबर 2025 में ही लगभग 2000 पेड़ो पर कुल्हाड़ी चल चुकी है लेकिन फ़िलहाल एनज़ीटी (NGT) के एक आर्डर के बाद कटाई बंद है. सबसे दुःख की बात ये है कि ना भोपाल स्मार्ट सिटी बन पाया और ना मेट्रो के लिए पैसेंजर मिल पा रहे हैं. लेकिन हज़ारों वृक्षों का बलिदान जरूर हो गया.
देशदीप सक्सेना
भोपाल: स्मार्ट सिटी और मेट्रो परियोजनाओं के नाम पर हज़ारों पेड़ काटे गए, वाहन बढ़ते गए और हवा ज़हरीली होती चली गई। सवाल यह है कि क्या विकास की यह राह भोपाल को रहने लायक शहर बनाएगी या पेड़-विहीन कंक्रीट का जंगल?
झीलों की नगरी भोपाल को कभी हरियाली, साफ़ हवा और संतुलित पर्यावरण के लिए जाना जाता था। लेकिन बीते एक दशक में विकास के नाम पर जिस तरह से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई है, उसने इस पहचान को गंभीर संकट में डाल दिया है। स्मार्ट सिटी और मेट्रो जैसे महत्वाकांक्षी शहरी प्रोजेक्ट्स ने भोपाल के पर्यावरण पर जो बोझ डाला है, उसके दूरगामी परिणाम अब साफ़ दिखाई देने लगे हैं।
पिछले दो दिनों से भारत माता चौराहे ( जवाहर चौक के निकट) से भदभदा रोड तक धरती माता को वृक्ष विहीन करने की मुहिम शुरू हो गयी है. इसकी शुरुआत बरगद के करीब सौ साल पुराने एक पेड़ की कटाई से शुरू हो चुकी है.हरियाली की चुनरी का हरण मेट्रो के कंक्रीट पिल्लर्स खड़ा करने के लिया किया जा रहा है.
2024 के शुरुआत में सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आँकड़े बताते हैं कि भोपाल स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत चार उप-परियोजनाओं में 2884 पेड़ काटे गए। इनमें टीटी नगर स्टेडियम के पास हाट बाज़ार तैयार करने में 147 वृक्षों पर आरी चलाई गयी , रोड निर्माण में 579, बुलेवार्ड स्ट्रीट 850 और सरकारी आवास परियोजना पलाश होटल के पास 1,308 पेड़ों का कत्लेआम किया जाना शामिल है शामिल हैं।

इसके अलावा, भोपाल मेट्रो रेल परियोजना में जून 2024 तक 3101 पेड़ों की कटाई हो चुकी थी सबसे ज़्यादा 1555 पेड़ एम्स (AIIMS) से सुभाष नगर चौराहे के बीच काटे गए. विकास के नाम पर वृक्षों का ये विनाश चिंता का विषय है। इन परियोजनाओं के बदले सरकार ने मुआवज़े के तौर पर स्मार्ट सिटी के लिए 1.41 करोड़ रुपये और मेट्रो के लिए 1.92 करोड़ रुपये की राशि वसूल की है।
मध्य प्रदेश शहरी क्षेत्रों में वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 2001 के अनुसार, काटे गए हर एक पेड़ के बदले चार पेड़ लगाना अनिवार्य है। सवाल यह है कि क्या यह प्रतिपूरक वृक्षारोपण वास्तव में ज़मीन पर हुआ है, या यह सिर्फ़ फ़ाइलों और खातों तक सीमित रह गया? जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भोपाल और उसके आसपास के इलाकों में वन क्षेत्र का तेज़ी से सिमटना बेहद खतरनाक संकेत है।

इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR 2019) के अनुसार, भोपाल के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (2,772 वर्ग किलोमीटर) का सिर्फ़ 11.86 प्रतिशत ही वन क्षेत्र बचा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2017 की तुलना में पिछले दो वर्षों (2015 -16) में भोपाल में वन आवरण में 25 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों के मुताबिक, भोपाल में बड़े पैमाने पर पेड़ कटाई की शुरुआत बीआरटीएस कॉरिडोर के निर्माण के दौरान हुई थी। इसके बाद स्मार्ट सिटी, सड़क चौड़ीकरण और मेट्रो रेल के निर्माण ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया। इसके भी पहले, टीटी नगर क्षेत्र में जहाँ अभी गैमन इंडिया का मुँह चिढ़ाता अधबना कंक्रीट जंगल खड़ा है वहां करीब दो हज़ार से ज्यादा पेड़ काटे गए थे.
जून 2019 में जारी एक स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में भोपाल में साढ़े चार लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। ग्लोबल अर्थ सोसाइटी फॉर एनवायरनमेंट, एनर्जी एंड डेवलपमेंट (G-SEED) ने तो चेतावनी दी थी कि भोपाल तेज़ी से “पेड़-विहीन शहर” की ओर बढ़ रहा है, जहाँ 2009 से 2019 के बीच वन क्षेत्र 35 प्रतिशत से घटकर सिर्फ़ 9 प्रतिशत रह गया।इस हरियाली संकट का सीधा असर शहर की आबो हवा पर पड़ रहा है।

जैसे पेड़ो की ये अंधाधुंध कटाई ही पर्याप्त नहीं थी, अब अयोध्या बाई पास के चौड़ीकरण में लगभग 8000 पेड़ों को काटा जाना तय है. सिर्फ दिसंबर 2025 में ही लगभग 2000 पेड़ो पर कुल्हाड़ी चल चुकी है लेकिन फ़िलहाल एनज़ीटी (NGT) के एक आर्डर के बाद कटाई बंद है. सबसे दुःख की बात ये है कि ना भोपाल स्मार्ट सिटी बन पाया और ना मेट्रो के लिए पैसेंजर मिल पा रहे हैं. लेकिन हज़ारों वृक्षों का बलिदान जरूर हो गया.
मध्य प्रदेश विधानसभा में 25 फरवरी, 2025 को परिवहन विभाग द्वारा दिए गए आँकड़ों के अनुसार, भोपाल में कुल 15,07,613 वाहन पंजीकृत हैं। इनमें 10,80,556 दोपहिया और 2,90,272 चार पहिया वाहन शामिल हैं। बढ़ता ट्रैफिक, खराब सड़कें और निर्माण कार्यों से उड़ती धूल—ये सब मिलकर भोपाल की हवा को ज़हरीला बना रहे हैं। पेड़, जो प्राकृतिक एयर फ़िल्टर का काम करते हैं, जब लगातार काटे जाएंगे तो प्रदूषण का स्तर बढ़ना तय है।दिल्ली का उदाहरण हम सबके सामने है।
यह सवाल अब और टालने लायक नहीं रहा कि क्या विकास की मौजूदा परिभाषा टिकाऊ ( sustainable) है?
स्मार्ट सिटी का मतलब सिर्फ़ चौड़ी सड़कें, कंक्रीट के फ्लाईओवर और चमकदार इमारतें नहीं हो सकता। अगर विकास के बदले शहर अपनी सांस लेने की क्षमता ही खो दे, तो वह विकास नहीं, आत्मघाती नीति है।
ज़रूरत है कि भोपाल में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को गंभीरता से लिया जाए। प्रतिपूरक वृक्षारोपण की स्वतंत्र ऑडिट हो, बड़े और स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जाएँ, और हर नई परियोजना में पर्यावरणीय लागत को केंद्र में रखा जाए। वरना आने वाले वर्षों में भोपाल सिर्फ़ झीलों का नहीं, बल्कि धुएँ, धूल और सूखे पेड़ों के ठूंठों का शहर बनकर रह जाएगा।

