“यद्यपि पीने का पानी नदियों, जलाशयों और बांधों जैसे सतही जल निकायों से प्राप्त किया जा रहा है, फिर भी बार-बार किए गए जल गुणवत्ता परीक्षणों से मानव उपभोग के लिए आपूर्ति किए गए उपचारित जल में फेकल कोलीफॉर्म, ई. कोली, विब्रियो प्रजाति और प्रोटोजोआ जैसे रोगजनक संदूषकों की मौजूदगी का पता चला है.
ऐसा संदूषण स्पष्ट रूप से पेयजल वितरण प्रणालियों में सीवेज की घुसपैठ को दर्शाता है; यह एक ऐसी स्थिति है जो बुनियादी ढांचे की लगातार विफलताओं, खराब रखरखाव और सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग के स्थापित मानदंडों के उल्लंघन के बिना पैदा नहीं हो सकती थी.”
— जस्टिस शिव कुमार सिंह एवं विशेषज्ञ सदस्य ईश्वर सिंह, एनजीटी, सेंट्रल बेंच
भोपाल, 16 जनवरी, 2026
इंदौर त्रासदी, जिसमें अब तक 23 लोगों की जान जा चुकी है, पर गंभीर संज्ञान लेते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इसे गवर्नेंस की गंभीर विफलता बताया है और सरकार से राज्य भर के लोगों को सुरक्षित पानी सुनिश्चित करने के लिए तत्काल उपाय करने को कहा है, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, सेंट्रल बेंच के आदेश के अनुसार.
बेंच ने राज्य सरकार और राज्य भर के सभी जिलों के नगर निगमों को नागरिकों की शिकायतों को सुनने और उनका समाधान करने के लिए एक वॉटर ऐप विकसित करने और राज्य में बांधों, तालाबों, कुओं और बावड़ियों में प्रदूषण की जांच करने के उपाय करने का निर्देश दिया. सरकार से इन वाटर बॉडीज में मूर्तियों का विसर्जन प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया है.
दिसंबर 2025 के अंत और इस साल जनवरी की शुरुआत में, इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी की सप्लाई होने से 2000 से ज्यादा लोग बीमार हो गए जिन्हें इलाज के लिए विभिन्न अस्पतालों में ले जाया गया पर इनमें से कई लोगों की मौत हो गयी.

सरकार ने अभी तक दूषित पानी पीने से 15 मौतों का होना स्वीकार किया है पर स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार अभी तक 24 लोगों की मृत्यु हो चुकी है तथा कई अभी भी विभिन्न अस्पतालों में इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती हैं.
सरकार ने माना है की दूषित पानी की सप्लाई सीवेज लाइन से क्षतिग्रस्त पीने के पानी के पाइप और स्थानीय बोरवेल में रिसाव के कारण हुई. इस घटना के बाद इंदौर नगर निगम आयुक्त को हटा दिया गया जबकि एक अपर आयुक्त तथा एक अधीक्षण अभियंता जो कि जल आपूर्ति के प्रभारी थे उन्हें शासकीय सेवा से निलंबित कर दिया गया.
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, सेंट्रल बेंच का आदेश गुरुवार (15 जनवरी, 2026) को राशिद नूर खान और कमल कुमार राठी द्वारा दायर दो अलग–अलग आवेदनों पर सुनवाई के दौरान आया.
आदेश की प्रति के अनुसार, जस्टिस शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य ईश्वर सिंह की एनजीटी (NGT) बेंच ने अपने फैसले में कहा, “इस संकट ने गवर्नेंस की गंभीर विफलताओं को उजागर किया है, जिसमें आपातकालीन प्रतिक्रिया में देरी, प्रभावित व्यक्तियों और मृतकों की संख्या को लेकर विरोधाभासी खुलासे, और पारदर्शिता व जवाबदेही की कमी शामिल है.”
बेंच ने आगे कहा कि यह घटना कोई इकलौती घटना नहीं थी, बल्कि यह शहरी जल प्रबंधन की एक व्यापक और व्यवस्थागत विफलता को दर्शाती है. मध्य प्रदेश के अन्य शहरों जैसे भोपाल, खरगोन, उज्जैन, ग्वालियर, रीवा और सतना में भी इसी तरह की स्थितियां और पानी दूषित होने के जोखिम पाए गए हैं, जो पूरे राज्य में पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए लगातार बने हुए खतरे को दिखाते हैं.
राज्य सरकार को ‘असुरक्षित जल बुनियादी ढांचे की मौजूदगी और समान सुरक्षा उपायों के अभाव‘ के प्रति सचेत करते हुए बेंच ने कहा कि यह स्थिति जलजनित महामारियों के दोबारा होने का एक बड़ा खतरा पैदा करती है.

जस्टिस सिंह और विशेषज्ञ सदस्य ईश्वर सिंह ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि पीने के पानी का दूषित होना जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की संवैधानिक गारंटी का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का अधिकार भी शामिल है.
एनजीटी बेंच ने राज्य सरकार और सभी जिलों के नगर निगमों को निर्देश दिया कि वे शिकायतों को सुनने और नागरिकों को पर्याप्त पानी की आपूर्ति की निगरानी के लिए एक ‘वॉटर ऐप‘ तैयार करें। बेंच ने कहा, “नगर निगम इस ऐप का व्यापक प्रचार–प्रसार करेगा और इसकी 24 घंटे कार्यक्षमता सुनिश्चित करेगा.”
पानी के दूषित होने के संबंध में बेंच ने कहा, “हाल ही में बड़े पैमाने पर लोगों के बीमार होने और मौतों की घटनाओं ने इस मुद्दे को डरावना बना दिया है. इन घटनाओं ने जलापूर्ति बुनियादी ढांचे, सीवरेज प्रबंधन, निगरानी प्रणाली और नियामक देखरेख में गंभीर कमियों को उजागर किया है.”
बेंच ने कहा कि नदियों, जलाशयों और बांधों जैसे सतही जल स्रोतों से पानी लेने के बावजूद, बार–बार किए गए जल गुणवत्ता परीक्षणों में इंसानी खपत के लिए सप्लाई किए जा रहे पानी में ‘फैकल कोलीफॉर्म‘, ‘ई कोली‘, ‘विब्रियो प्रजाति‘ और ‘प्रोटोजोआ‘ जैसे रोगजनक तत्व पाए गए हैं.
बेंच ने टिप्पणी की, “यह स्थिति बुनियादी ढांचे की लगातार विफलताओं, खराब रखरखाव और सार्वजनिक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग मानकों के उल्लंघन के बिना पैदा नहीं हो सकती थी.”
बेंच ने कहा कि कई शहरों में पीने के पानी की पाइपलाइनें और सीवेज लाइनें एक–दूसरे के बहुत करीब बिछी हुई हैं, जो अक्सर एक–दूसरे को काटती हैं या समांतर चलती हैं. कई मामलों में, पानी की पाइप लाइनें सीवर लाइनों या नालियों के नीचे बिछाई गई थीं, जिससे लीकेज या दबाव की स्थिति पानी के दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है.
बेंच ने कहा, “भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय तकनीकी मैनुअल के स्पष्ट दिशा–निर्देशों के बावजूद, पानी की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी की कमी, ओवरहेड टैंकों और संपवेल के अपर्याप्त रखरखाव और प्रिवेंटिव निगरानी उपायों को अपनाने में विफलता ने इस मुद्दे की गंभीरता को और बढ़ा दिया है.”
जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 31(1), 31(2), 42 और 43 के उल्लंघन का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी हालिया अधिसूचना (10.11.2023) भी पीने के पानी की गुणवत्ता के मामलों में पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर देती है.
राज्य सरकार और नगर निगमों को एनजीटी बेंच के अन्य निर्देश इस प्रकार हैं:
(i) पाइपलाइन बिछाने (यदि पहले से नहीं बिछी है) और लीकेज को ठीक करने जैसे सभी उपाय करके पानी के ‘ट्रांसमिशन लॉस‘ को खत्म करें।
(ii) उन सभी जल निकायों (जहां से पानी लिया जाता है) के आसपास से सभी अतिक्रमण हटाएं और किसी भी तरह की अवैध घुसपैठ को रोकें.
(iii) नगर निगम पीने के पानी की सप्लाई के लिए उपयोग किए जाने वाले सभी ओवरहेड टैंकों और संपवेल को हर समय फंक्शनल रखेगा और उनकी समय–समय पर सफाई और क्लोरीनीकरण कराएगा.
(iv) नगर निगम हर साल मार्च से जुलाई के बीच गर्मियों के दौरान निर्माण कार्यों को रोकने की योजना बनाएगा और इन महीनों के दौरान वार्ड–वार पानी की आपूर्ति को विनियमित करेगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रत्येक नागरिक को एक दिन छोड़कर पानी मिल सके.
(v) नगर निगम सार्वजनिक कुओं/बावड़ियों और ट्यूबवेल के आसपास के इलाकों में पानी की आपूर्ति के लिए जल पुनरुद्धार का काम करेगा. इसे वॉटर ऐप में भी शामिल किया जाएगा.
(vi) नगर निगम, राज्य सरकार के सहयोग से एक व्यापक जल संचयन (Water Harvesting) योजना तैयार करेगा और इसे सख्ती से लागू करेगा. नियमों का पालन न करने वाले व्यक्तियों, सरकारी/केंद्रीय संस्थानों, स्कूलों और कॉलेजों पर दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान किए जाएंगे.
(vii) नगर निगम टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति की एक व्यापक योजना तैयार करेगा ताकि जरूरत पड़ने पर कमी को पूरा किया जा सके.
(viii) नगर निगम घरेलू उपयोग के लिए सप्लाई किए जाने वाले पानी का क्लोरीनीकरण सुनिश्चित करेगा.
(ix) नगर निगम घरेलू और गैर–घरेलू पानी के उपयोग के संबंध में ‘क्या करें और क्या न करें‘ (Do’s and Don’ts) की शर्तें तय करेगा.
(x) नगर निगम सभी घरेलू और गैर–घरेलू जल आपूर्ति के लिए मीटर लगाएगा.
(xi) नगर निगम और राज्य प्रशासन यह सुनिश्चित करेंगे कि दो से अधिक दुधारू पशुओं वाली सभी डेयरियों को इस आदेश के 4 महीने के भीतर शहर के बाहर उनके लिए निर्धारित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया जाए.
(xii) नगर निगम नियमित रूप से पानी के शुद्धिकरण के लिए प्री–क्लोरीनीकरण, पोस्ट–क्लोरीनीकरण और वायु संचारण (Aeration) प्रक्रिया का सहारा लेगा.

