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    Home » नर्मदा परिक्रमा सिर्फ भौगोलिक नहीं, स्वयं के भीतर उतरने की प्रक्रिया है : प्रह्लाद सिंह पटेल
    DISCOURSE

    नर्मदा परिक्रमा सिर्फ भौगोलिक नहीं, स्वयं के भीतर उतरने की प्रक्रिया है : प्रह्लाद सिंह पटेल

    suntodayBy suntodayJanuary 4, 2026No Comments31 Views3 Mins Read
    पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल अपनी पुस्तक 'परिक्रमा कृपा सार' पर आयोजित गोष्ठी के दौरान (बीच में). पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (बाएं)
    आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को केवल आस्था नहीं देती, बल्कि उसे कर्म, रोजगार और अवसरों के प्रति सजग तथा समर्थ भी बनाती है.
    जब जीवन में उद्देश्य और साधना का संतुलन होता है, तब व्यक्ति स्वयं अपने लिए मार्ग निर्मित करता है.

    जयपुर: नर्मदा परिक्रमा के महत्व को बताते हुए मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि यह परिक्रमा केवल परिक्रमा नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने की प्रक्रिया है.

    प्रह्लाद सिंह पटेल ने यह बात राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में अपनी पुस्तक ‘परिक्रमा कृपा सार’ पर आयोजित एक गोष्ठी में कही.

    प्रह्लाद सिंह पटेल की गिनती उन गिने–चुने राजनेताओं में होती है जिन्होंने पैदल चलकर नर्मदा नदी की परिक्रमा की है.

    उन्होंने परिक्रमा दो बार की है—पहली बार अपने गुरु श्री बाबा श्री जी के सान्निध्य में और दूसरी बार सपत्नीक.

    वर्तमान में उनकी पुत्री प्रतिज्ञा पटेल भी नर्मदा परिक्रमा कर रही हैं.

    ज्ञातव्य है कि ‘परिक्रमा कृपा सार’ का विमोचन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन हॉल में पिछले वर्ष 14 सितंबर को किया था.

    ’परिक्रमा कृपा सार’ नर्मदा परिक्रमा के दौरान प्रह्लाद सिंह पटेल के अनुभवों पर आधारित लिखे गए लेखों का संकलन है.

    राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर, जयपुर में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ स्तंभकार, लेखक और पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी उपस्थिति थे.

    कार्यक्रम में प्रह्लाद सिंह पटेल ने मां नर्मदा की परिक्रमा से जुड़े अपने अनुभवों और आत्मिक यात्राओं का सार साझा किया.

    उन्होंने कहा कि, “परिक्रमा केवल नदी की परिक्रमा नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने की प्रक्रिया है.”

    उन्होंने कहा कि, “यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आत्मा की परिक्रमा है, जिनके अनुभव इस कृति में साधना और संवेदना के रूप में साकार हुए हैं.”

    इसी संदर्भ में उन्होंने युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए यह भी कहा कि आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को केवल आस्था नहीं देती, बल्कि उसे कर्म, रोजगार और अवसरों के प्रति सजग तथा समर्थ भी बनाती है.

    उनके अनुसार, जब जीवन में उद्देश्य और साधना का संतुलन होता है, तब व्यक्ति स्वयं अपने लिए मार्ग निर्मित करता है.

    परिचर्चा के दौरान उन्होंने पुस्तक के वैचारिक पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि वे लंबे समय से स्त्री तत्व पर चिंतन कर रहे हैं, और इस पुस्तक में पौरुष तत्व तथा मां की भूमिका का संतुलित विवेचन उन्हें गहराई से प्रभावित करता है.

    उन्होंने अपने गुरु श्री बाबा श्री जी के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि, “यदि पौरुष जागता है तो मानव पारस बन सकता है.”

    यह कथन मानव जीवन के गूढ़ दर्शन को उद्घाटित करता है और सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराता है.

    इस गोष्ठी के समन्वयक देवेंद्र शर्मा थे, जबकि सामाजिक और साहित्यिक जगत के अनेक गणमान्य नागरिक भी इस अवसर पर उपस्थिति थे.

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